उधमिता क्या है महत्त्व,अवधारणा एवं विशेषताएं

रिचार्ज कैन्टीलोन ने सबसे पहले उधमिता शब्द का प्रयोग किया था, उधमी शब्द जिसे अंग्रेजी में Entrepreneur कहते है जिसका अर्थ होता है – एक ऐसा अकेला व्यक्ति जो किसी संगठन या व्यवसाय की स्थापना का जोखिम उठाता है उद्यमी कहलाता है एवं जिन कार्यों को उधमी द्वारा संपन्न किए जाते हैं उन्हें उद्यमिता कहा जाता है।

उधमिता साधारण तौर पर अनेक जोखिम और अनिश्चिताओ के साथ नए उद्योग को आरंभ करने और उसका संचालन कर उसे नई-नई उपलब्धियों तक पहुंचाना उधमिता कहलाती है।

उधमिता सदैव नवीन आइडिया के साथ उत्पन्न होती है, उधमिता एक अनुभव मात्र है जो विज्ञान और व्यवहार दोनों के सहयोग से बनती है, उद्यमिता व्यापार का ही एक रूप है जिसमें अनेक जोखिम होते हैं, और उन्हीं जोखिम को लेने वालों को उधमी कहा जाता है।

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उस देश में रहने वाले उद्यमी व्यक्तियों पर ही निर्भर करती है उधमिता ही वह साधन है जिसके द्वारा भारत दोबारा से सोने की चिड़िया बन सकता है अमेरिका जापान चाइना जैसे देशों की प्रगति का कारण उधमिता ही है।

उद्यमिता की परिभाषा क्या है?

विद्वानों की नजर में उधमिता की परिभाषाएं-

एचडब्ल्यू जॉनसन:- उधमिता 3 आधार तत्वों अनुसंधान, नवप्रवर्तन और अनुकूलन का जोड़ा है।

प्रो राव:- उधमिता वातावरण का सृजनात्मक तथा नवप्रवर्तनकारी प्रयुत्तर है।

जोसेफ ए शुंपीटर:- उधमिता एक नवप्रवर्तन कारी कार्य है यह स्वामित्व की अपेक्षा नेतृत्व कार्य है।

लॉक्स:- उधमिता जोखिम उठाने की इच्छा, आय और प्रतिष्ठा की चाहत तथा आत्म अभिव्यक्ति, सृजनशीलता और स्वतंत्रता की अभिलाषा का सम्मिश्रण है।

जेई स्टीफन:- उधमिताक किसी उपक्रम में जोखिम वहन करने की शक्ति, संघठन की योग्यता विविधीकरण करने तथा नव-प्रवर्तकों की इक्छा है।

उपयुक्त परिभाषा ओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि – उधमिता का तात्पर्य व्यवसाय में निहित विभिन्न जोखिमों को वहन करने की क्षमता से होता है। इसके अंतर्गत नए उपक्रमों की स्थापना तथा नवीन परिवर्तनों को क्रियान्वित करने की साहसिक क्षमता को शामिल किया जाता है।

उद्यमिता का महत्व

कोई भी देश चाहे वह विकसित हो या विकासशील उसकी आर्थिक व्यवस्था उद्यमिता पर ही निर्भर करती है, यही कारण है कि भारत सरकार एवं भारत के प्रत्येक राज्य सरकारें उधमिता विकास पर जोर शोर से महत्व दे रहे हैं। उद्विकास के कारण कोई भी देश अपनी आर्थिक प्रगति कर सकता है एवं इसके द्वारा आत्मनिर्भर समाज की स्थापना की जा सकती है।

उधमिता के महत्व को इन चार बिंदु मैं विवेचन किया जा सकता है –

1. नव प्रवर्तन ( इनोवेशन )
2. रोजगार के अवसरों का विस्तार
3. निर्यात तथा आयात में विस्तार
4. देश का संतुलित आर्थिक विकास

1. इनोवेशन: इनोवेशन की गति ही किसी देश या समाज की विकास की गति निर्धारित करती है।

1.1 मार्केट एवं ग्राहकों की जरूरतों और रुचि ऊपर गहरी रिसर्च के बाद एक उद्यमी उत्पादन कार्य शुरु करता है।

1.2 एक उद्यमी ग्राहकों को कम लागत में श्रेष्ठ उत्पाद प्रदान करना चाहता है जिसके लिए वह नई-नई तकनीकों को हमेशा आजमाता रहता है।

1.3 अपने उत्पादों का परिचय आकर्षक विज्ञापनों के माध्यम से करता है एवं वह माउथ मार्केटिंग का प्रयोग कर उपभोक्ताओं तक अपने उत्पादों को पहुंचाता है।

2.रोजगार का विस्तार: उधमिता इनोवेशन के साथ देश या समाज में रोजगार के अधिक अवसर उत्पन्न करती है। उद्यमी नवीन औद्योगिक इकाइयों की स्थापना करता है जिसके कारण अनेक व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त होता है और बेरोजगारी पर लगाम लगता है इसलिए उधमिता विकास को बेरोजगारी के समाधान का सर्वोत्तम विचार माना जाता है।

3.देश का संतुलित आर्थिक विकास: उधमिता से देश का औद्योगिक विकास होता है, राष्ट्रीय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है, बचत एवं पूंजी निर्माण दर में वृद्धि होती है जिससे देश का संतुलित आर्थिक विकास संभव होता है।

उद्यमिता की अवधारणा

उधमिता की अवधारणाएं निम्नलिखित हैं-

1. नवकरण की अवधारणा ( Innovation Concept)- जोसेफ ए शुम्पीटर के अनुसार – उधमिता एक नवप्रवर्तन कार्य है यह स्वामित्व की अपेक्षा नेतृत्व का कार्य है। उधमिता वास्तव में इनोवेशन को प्रोत्साहित करती है।

2. सामाजिक अवधारणा (Social Concept)- उधमिता एक सामाजिक प्रक्रिया है जो समाज से प्रभावित होती है तथा समाज को भी प्रभावित करती है। उधमिता सामाजिक जीवन की पृष्ठभूमि पर आधारित होती है। उधमिता समाज को जीवन स्तर प्रदान करती है वहीं समाज में व्याप्त प्रचलित रीति रिवाज, रहन सहन, वेशभूषा, परंपराओं से प्रभावित होती है।

3. प्रबंध की अवधारणा ( Managerial Concept )- हौसलिज के अनुसार प्रबंधकीय नेतृत्व कुशलता उधमिता के महत्वपूर्ण पहलू होते हैं। इस अवधारणा के अनुसार प्रबंध उधमिता का माध्यम है क्योंकि प्रबंध के माध्यम से ही उधमी अपने मूल लक्ष्यों को प्राप्त करता है तथा व्यवसाय में नवीन तकनीक, पर परिवर्तन वा सुधार को अपनाता है।

4. क्रियात्मक अवधारणा ( Functional Concept )- उधमिता की अवधारणा प्रबंधकीय नियोजन तथा क्रियान्वयन संबंधी प्रक्रिया को स्पष्ट करता है। इस अवधारणा के अनुसार उधमी उपक्रम की उद्देश पूर्ण क्रियाओं के नियोजन, संगठन, निर्देशन, अभिप्रेरण तथा समन्वय के माध्यम से व्यवसाय क्रियायों को निष्पादित करता है।

5. नेतृत्व अवधारणा ( leadership Concept )- उद्योग नेतृत्व कार्य कार्य है। वह नए व्यापार की स्थापना व संचालन संबंधी विभिन्न कार्य संपादित करते हुए व्यवसाय को नेतृत्व प्रदान करता है।

6. पेशेवर अवधारणा ( Professional Concept )- वर्तमान समय में उद्यमिता को पेशाब आने जाने लगा है जिस प्रकार से प्रबंध एक पेशा है, उसी प्रकार उधमिता भी एक पेशा है।

7. उदारवाद व्यापक अवधारणा- इस अवधारणा के अनुसार उधमी उदार होता है, वह व्यवसाय से संबंधित विभिन्न पक्षकारों से उदार व सहयोग पूर्ण व्यवहार करता है।

8. जोखिम अवधारणा- उधमिता को जोखिम वहन करने वाला कार्य माना जाता है प्रत्येक प्रकार का व्यवसाय अनेक प्रकार के जोखिम से भरा रहता है, व्यवसाय में पग पग पर अनेक जोखिमों का सामना करना पड़ता है।

उधमिता की विशेषताएं

उधमिता कि विशेषताएं निम्न हैं-

  1. मूल रुप से उधमिता नये परिवर्तनों, तकनीकी, उत्पादन आदि से शुरु होती हैं।
  2. उधमिता उच्च जोखिमों को वहन करने की भावना और क्षमता हैं।
  3. ज्ञान कि आधार उधमिता सही व्यवहार का ही परिणाम है यह सिर्फ एक विज्ञान और कला मात्र नहीं हैं।
  4. उधमिता भाग्य या किस्मत को नहीं मानती है यह तो सिर्फ लक्ष्यों, उद्देश्यों और परिणाम को ही प्राथमिकता देती हैं।
  5. सामाजिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, तकनीकी आदि के वातावरण में परिवर्तनों को ध्यान में रखकर उधमी प्रवृत्ति का विकास होता हैं।
  6. उधमिता वास्तव में एक रचनात्मक प्रक्रिया है।
  7. व्यापार को शुरु करने से लेकर लगातार कार्य करते हुए उसे उच्च मुकामो तक पहुंचाने की निरंतर प्रक्रिया उधमिता हैं।
उधमिता क्या है महत्त्व,अवधारणा एवं विशेषताएं

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