रुपये की आत्मकथा पर निबंध 500+ हिंदी शब्दों में – मैं रुपए हूँ!

रुपये की आत्मकथा

Rupaye Ki Atmakatha :- 200 शब्दों में नहीं और न ही 300 शब्दों में बल्कि पूरे 500+ Words के साथ आज फिर एक Essay in Hindi “रुपये की आत्मकथा पर निबंध” प्रस्तुत करने जा रहे है हमें उम्मीद है आपको यह हिंदी में निबंध अति पसंद आने वाला है।

रुपये की आत्मकथा रुपरेखा

  1. प्रस्तावना
  2. मेरा जन्म
  3. मेरा परिसंस्कार एवं यात्रा-चक्र
  4. मेरी महिमा
  5. उपसंहार

रुपये की आत्मकथा – प्रस्तावना

मैं रुपया अर्थात् रूपवान किसको प्रिय नहीं हूँ। कर छोटे से परन्तु सन्तुलित एवं सुदृढ़ आकार वाला, स्वरूप परिवर्तन का शौकीन मैं किसी को महत्त्व नहीं देता हूँ। यदि मैं स्वयं से रुपन महान् खोजूं भी तो, है कहाँ ? सभी मेरे भक्त हैं, याचक हैं, है- सेवक हैं।

मेरे कारण प्राचीन-से-प्राचीन परम्परा, बड़े-से-बड़े से जीवन मूल्य, घनिष्ठ-से-घनिष्ठ सम्बन्ध ताक पर रख दिये जाते हैं। संसार भर में मनुष्य मुझसे साक्षात्कार करने में अपना जीवन कित तक गँवा रहे हैं। उनमें से काफी मुझ तक आने से पूर्व ही विश्व से विदा ले लेते हैं। इस प्रकार मेरा प्रभाव अत्यन्त व्यापक है। 

मेरा जन्म

इस जगत् में आने से पूर्व मैंने बड़ी साधना की है। वर्षों तक पृथ्वी के गर्भ में छिपा रहकर मैंने कठिन यातनाएँ सहीं। मेरा अन्तरमन बाहर की खुली हवा में आने को लालायित था, किन्तु किसी ने मेरी नहीं सुनी। संयोग से एक भूचाल ने मेरी चिर इच्छा की पूर्ति की और मैं भू-गर्भ से बाहर वैज्ञानिकों के हाथों पड़कर नए-नए रूप पाने लगा।

मेरे रत्न, हीरा, सोना, चाँदी आदि नामकरण हुए। मेरे चारों ओर पहरे रहते तथा युवराज की भाँति मेरी देखभाल की जाती रही। शोधन, परिशोधन की प्रतिक्रियाओं को पार करके आए, मुझमें निष्ठुरता पर्याप्त मात्रा में बढ़ गयी थी।

मेरा परिसंस्कार एवं यात्रा चक्र

धरती पर आने के बाद जब मैंने सभी को अपनी ओर लालायित देखा तो मुझे अपने महत्त्व का अहसास हुआ। मेरे विविध रूप परिवर्तित किये गये, सोने, चाँदी धातुओं में मुझे विविध आकार-प्रकार दिये गये।

सन् 1661 ई. में स्वीडन के ‘बैंक ऑफ स्टॉक होम‘ में मुझे कागज में रूपायित किया। कागज के नोट के रूप में भारत में मेरा उदय सन् 1928 में हुआ। भारतीय नोट रूप में मेरा जन्म इण्डिया सिक्युरिटी प्रेस नासिक, महाराष्ट्र में हुआ तथा बाद में दूसरा प्रेस देवास (मध्य प्रदेश) में कार्यरत है। मैं हरे, नीले, लाल आदि रंगों में तीन सिंहों की सुरक्षा में सुशोभित हूँ ।

मेरी महिमा

सागर मंथन से प्राप्त लक्ष्मी जी मेरी देवी हैं। उन्होंने मुझे अपार महिमा प्रदान की है। सृष्टि के कोने-कोने तक मेरी महिमा व्याप्त है। जन्म, विवाह, समारोह, मरण आदि सभी में मेरी आवश्यकता होती है। यदि मैं न पहुँचूँ तो सभी रूखे तथा व्यर्थ दिखायी देते हैं।

जो भक्त मुझे प्रसन्न कर लेते हैं, उनका सभी पर प्रभाव रहता है। मैं किसी को भी हाथ खोलने का अवसर नहीं देता हूँ। मेरी इच्छा के विरुद्ध यदि कोई हाथ खोलकर चलता है तो मैं वहाँ से पलायन करके उसे दण्डित करता हूँ।

आज का युग मेरा ही है। देश, विदेश, साहित्य, संस्कृति, कला सभी में मेरी महिमा है। मेरे अभाव में पता नहीं कितनी किशोरियाँ अविवाहित रह जाती हैं, अपने प्राण गँवाती हैं। दूसरी ओर जिन्हें मेरा वरद आशीष मिल जाता है, वे सोल्लास जीवन-यापन करते हैं।

उपसंहार

बालक, युवा-युवती, प्रौढ़-वृद्ध, सभी मुझे प्यार करते हैं और स्पष्ट कहते हैं। ‘बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपय्या’। संसार का कोई भी काम मेरे होने पर रुकता नहीं है-‘दाम करे सब काम’। आप ध्यान रखें कि मैं किसी एक से स्थायी सम्बन्ध रखने का अभ्यस्त नहीं हूँ।

मैं गतिमान रहता हूँ। मेरी कथा बहुत व्यापक है। इतने से ही समझ गए होंगे मैं कितना महान् हूँ।

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